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संघर्षी,गतिमान मनुष्य का जीवन The Life of a struggling man

संघर्षी,गतिमान मनुष्य का जीवन The Life of a struggling man

संघर्षपूर्ण जीवन


कुछ लोगों को में इसलिए खलता हूं
क्योंकि मैं उनके साथ नहीं,,विरोध में चलता हूं
और मैं गर्दिशों का वो चिराग हूं
जो अंधेरों में ही नहीं
तूफान में भी शान से,,जलता हूं

रोकती है बेड़ियां पैरों को दायरे में
और मैं बेखबर, सीमा के उस पार ही चलता हूं

में भूगोल ही नहीं, इतिहास भी बदलता हूं
सब रूक जाते हैं एक मंजिल पर
और मैं मंजिल के पार चलता हूं

में गतिमान हूं,,और समय के साथ चलता हूं
में वक्त से किस्तम नहीं
हाथों से हालात बदलता हूं

WRITER VEERU Ji
That’s why i eat
Because I’m not with them, walk in protest
And I am the lamp of the clouds
Which is not only in the dark
Even in a storm, I am jealous

Restricts the fetters in the feet
And I walk across the border, oblivious

I change not only geography but also history
Everyone stops on one floor
And i walk across the floor

I’m in motion
I don’t have time
Change hands

Veeru ji

INDIAN WRITER

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