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AYUSH MINISTRY orders to Patanjali ‘s ayurvedic medicine to stop advertising and publicising its calms


आयुष मंत्रालय ने विश्व मे भारत की बेइज्जती होने से पहले ही नेपाली नागरिक बालकृष्ण के स्वामित्व वाली कम्पनी पतंजलि के कोविड की दवाई बनाने की घोषणा के बाद जवाब तलब कर लिया है। अगर यह नही करती तो विश्व मे बड़ी बेइज्जती होती क्योंकि आयुष मंत्रालय की बिना अनुमति के या संज्ञान में लाए कैसे पतंजलि दावा कर सकती है। Patanjali corana virus medicine name is coronil.

वास्तव में वेक्सीन का ट्रायल कोई मजाक नही है। में स्वयं इस पूरे प्रोसीजर को नजदीक से देख रखा है जिसमे ड्रग्स के ऊपर किए जाने वाले “क्लिनिकल रिसर्च” के लिए भारत सरकार के कड़े नियम है।

अहमदाबाद में ऐसी ही कई क्लिनिकल रिसर्च करने वाली मल्टीनेशनल कम्पनियो में मेने देखा है कि वँहा पर इस पर रिसर्च की जाती है कि किसी नए वैक्सीन या ड्रग्स के मानव शरीर पर किस प्रकार का प्रभाव पड़ते है, इस प्रकार के रिसर्च के बाद ही यह अंतिम रूप से दवाई के रूप में बाजार में आती है।

इसके लिए 100 लोगो (कम ज्यादा भी हो सकते है) को नई ड्रग्स दी जाती है, उसके बाद डॉक्टर या विशेषज्ञ लगातार इन सभी की नब्ज से लेकर हर गतिविधि पर नजर रखकर पूरा विश्लेषण करके यह देखते है कि वैक्सीन की डोज देने पर मनुष्य के शरीर मे क्या प्रभाव हो रहा है, इसके बाद इसकी पूरी रिपोर्ट बनाकर भेजी जाती है।।

यह पूरी “क्लिनिकल रिसर्च” पूरी तरह से ICMR के संज्ञान में होती है। जिन लोगो पर ट्रायल होता है उन्हें “Subject” के नाम से पुकारा जाता है, उसपर ट्राइल करने से पहले उसका पूरा डाटा ICMR को भेजा जाता है, प्रत्येक व्यक्ति तीन/चार महीने में केवल एक बार ही अपने शरीर पर रिसर्च करवा सकते है। इसके लिए एक दिन के युवक को 7 हजार से ज्यादा तक मिलते है लेकिन जान का खतरा रहता है। ऐसी स्तिथि के लिए बीमा भी होता है। विदेशी मल्टीनेशनल कम्पनियों को अमरीका, यूरोप, विकसित देश में ऐसा ट्राइल अपने शरीर पर करवाने वाले कम मिलते है, इसलिए भारत उनके लिए सुलभ रहता है.

और इंहा बाबा बिना ऐसे ट्रायल के ही दवाई ला रहा है। Vikas kumar jatav

वास्तव में क्रोना कोई बड़ी बीमारी नही है। इसकी स्टेज है। इसमें दिक्कत उन्हें ही है जिनका इम्यूनिटी सिस्टम कमजोर है। बाकी गली मोहल्ले में बैठे वैध, हकीम बुखार, नजले के लिए “दुसांधा” जिसे काढा कहते है देते है, जो कि लाभ भी पहुचाते है। जिसमे जड़ी बूटियों को दो गिलास पानी मे गर्म करके उसे आधा गिलास पानी रह जाने तक उबाला जाता है, जिसे काढ़ा और सामान्य भाषा मे दुसांधा कहते है। आजकल रेडीमेट भी आ रहा है जैसे “जोशिना” नाम का प्रोडक्ट बाजार में काफी पहले से उपलब्ध है जो कि खांसी, पुराने से पुराने कफ को भी निकाल देता है।

कोरोना के इलाज हेतु पतंजलि आयुर्वेदिक दवा व पतंजलि के कोरण से जुड़े विज्ञापन को बंद करने के निर्देश दे दिए गए हैँ , सरकार ने पहले इसकी पूरी जांच न होने तक इस पर सभी तरह से रोक लगा दी हैं|

वायरस पर रिसर्च करने के लिए Biosafety Level-3 (BSL-3) laboratory फैसिलिटी का होना जरूरी है।
जिसके लिए बाकायदा लाइसेंस लेना पड़ता है।
पतंजलि लैब के पास केवल BSL-2 का लाइसेंस है।

ऐसे ही कोई मुंह उठाके खतरनाक वायरस रिसर्च नहीं कर सकता है।
1 गलत एक्सपेरिमेंट से पूरी दुनिया खतरे में पड़ सकती है।

रामदेव के पार्टनर बालकृष्ण किस आधार पर कह रहा है कि उसने कोरोना की वैक्सीन बना ली?
किस आधार पर कह रहा है की उसने सइंटिस्टों की टीम बिठा के वायरस पर रिसर्च की है? जबकि अभी पतंजलि आयुर्वेदिक के पास कोविद 19 वायरस मानक लैब भी नहीं हैं |


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